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रविवार, 28 नवंबर 2010

खदेरन ससुराल में …!

इस बार पर्व में खदेरन ससुराल गया।

उसकी सास चम्पई देवी लगातार सात दिनों तक उसे पालक का साग खिलाती रही।

बात आठवें दिन की है।

चम्पई देवी ने खदेरन से पूछा, “दामाद जी! आज क्या खाएंगे आप?”

खदेरन ने जवाब दिया, “सासु मां अब और मेहनत आप क्या करेंगी, ऐसा कीजिए कि खेत ही दिखा दीजिए, मैं खुद ही चर आऊंगा!”

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

रखवाली

मोहल्ले में चोरी के वारदात बढ गए थे।

कुछ भी सुरक्षित नहीं था।

फुलमतिया को चिंता सता रही थी कि कैसे घर की रखवाली की जाए।

उन्होंने मां से सलाह ली क्या करना चाहिए। उनकी मां चम्पई देवी ने कहा, “वैसे तो खदेरन के रहते तुझे समस्या नहीं होनी चाहिए थी, पर फिर भी तू एक  कुता रख ले, वो घर की रखवाली करेगा।”

फुलमतिया जी के आदेशानुसार खदेरन गया बाज़ार।

उसने दूकानदार से पूछा, “यह कुत्ता तो बहुत सुंदर है, कुछ घर की रखवाली वगैरह भी ठीक से करेगा तो।”

दुकानदार बोला, “जी बहुत अच्छी तरह से, बस जब भी चोर आए, इसे समय पर उठा सेना।”

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

ग़लती की सज़ा

ग़लती की सज़ा

तब उनकी नई-नई शादी हुई थी और फुलमतिया जी ने अपनी मां चम्पई देवी को फोन किया, “मां! मेरे पति खदेरन ने फिर मुझसे झगड़ा किया। अब मैं यहां एक पल भी नहीं रुक सकती। मैं आ रही हूं तुम्हारे पास।”

फुलमतिया जी की मां चम्पई देवी ने दिलासा देते हुए कहा, “नहीं बेटी! तू बिलकुल मत घबड़ा … खदेरन को उसकी ग़लती की सज़ा ज़रूर मिलेगी! मैं आ रही हूं तुम्हारे साथ रहने के लिए ……!”