शाही सवारी एक महाशय नवाबों के शहर लखनऊ पहुंचे। श्टेशन से बाहर रिक्शा स्टैंड पर आए तो एक रिक्शे वाले ने कहा, ”आइए हुज़ूर! नवाबों के इस शहर में इस शाही सवारी का आनंद लीजिए।” महाशय ने एक जगह का नाम बता कर पूछा, “वहां जाने का कितना भाड़ा है?” रिक्शे वाले ने फ़र्माया, “पंद्रह रुपए, दस रुपए या फिर पांच रुपए।” महाशय चौंके! बोले, “एक ही जगह के तीन किराए?” रिक्शे वाले ने बताया, “हां, हुज़ूर!” महाशय अचरज़ से बोले, “क्यों? .. कैसे??” रिक्शे वाले ने समझाया, “पंद्रह रुपए में हुज़ूर पिछली सीट पर तशरीफ़ फ़र्माएंगे और आपको यह नाचीज़ बड़े आराम से ले जाएगा। लखनऊ की सड़कों पर यह शाही सवारी बड़े शान और आराम से दौड़ेगी और हुज़ूर को कोई तकलीफ़ नहीं होगी। हुज़ूर से बिना कुछ पूछे, उनके बिना कुछ बताए यह ख़िदमतगार उन्हें उनकी मंज़िल तक पहुंचा देगा।” महाशय की उत्सुकता बढ़ी। पूछे, “…. और दस रुपए में?” रिक्शे वाले ने जानकारी दी, “दस रुपए में हुज़ूर को शाही सवारी मंज़िल तक पहुंचाएगी ज़रूर, लेकिन रास्ता बताना पड़ेगा। और लखनऊ की सड़कों का तो कोई भरोसा नहीं। यहां की ऊबड़-खाबड़ सड़कों की झोल-झाल से रिक्शे के हुड से चोट न लग जाए, इससे हुज़ूर को ख़ुद को बचाना होगा। उसका दोष इस ग़रीब पर न आए।” महाशय ने ठंढ़ी सांस भरी और पूछे, “… और पांच रुपए का क्या क़िस्सा है?” रिक्शे वाले ने हंसते हुए कहा, “अजी कुछ नहीं! बात बस इतनी सी है कि पांच रुपए में ये अदना सा इंसान पीछे की सीट पर तशरीफ़ रखेगा और हुज़ूर को तो लखनऊ की गलियों का पता तो मालुम है नहीं तो मैं रास्ता बताता जाऊँगा और हुज़ूर लखनऊ की सड़कों पर इस शाही सवारी के चलाने का लुत्फ़ उठाएंगे!” |