अब फाटक बाबू क्यों नहीं परेशान हों खंजन देवी से। ज़रा दोनों की बात-चीत सुनिए….
“डिनर पर बाहर चलें?”
“हां”
“क्या खाओगी?”
“कुछ भी।”
“चाइनीज़?”
“नहीं, मुझे गैस हो जाता है।”
“साउथ इंडियन?”
“क्या फाटक बाबू परसों ही तो खाए थे।”
“तो .. फिर … नॉन भेज?”
“अभी छठ के समय, आप भी न … पर्व त्योहार का भी ख्याल नहीं रखते।”
“तो रोटी-तड़का?”
“वही बोरिंग खाना…।”
“तो फिर तुम्ही बताओ…क्या खाना है?”
“कुछ भी।”
फाटक बाबू दफ़्तर जाने की हड़बड़ी में थे। नाश्ते के टेबुल पर तो कुछ नहीं बोले, पर दफ़्तर जाने से पहले थोड़ा नराज़ स्वर में बोलते गए, “बिल्कुल याद है!” और फाटक बाबू निकल गए।![[image[4].png]](https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgNQzRCNiv0oob5XuSoLLdXgWxiRE6_vOqDplG3QyE2yb7KOSTw6oo42WZY_3aJtmot-its_p2XzqYxz6tn_XmkWlU8tB7dPPFQcbXGmsXuz87yEc_luoOnyd_f522FmgUaFxGca17IlZw/s1600/image%5B4%5D.png)