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रविवार, 24 अप्रैल 2011

हीरों का हार

एक दिन सज-धज कर खदेरन घर से निकला।

फाटक बाबू की नज़र उस पर पड़ी। उन्होंने पूछ दिया, “बड़े सुबह सवेरे किस तरफ़ चले?”

खदेरन ने बताया, ‘फुलमतिया जी का जन्म दिन है। उनके लिए कोई गिफ़्ट खरीदने जा रहा हूं।”

फाटक बाबू ने प्रसन्न हो कहा, ‘वाह! बहुत अच्छी बात है! क्या लाने जा रहे हो?”

खदेरन ने जवाब दिया, “सोचता हूं हीरों के नेकलेस जैसा कोई हार ले आऊं!”

फाटक बाबू ने कहा, “आइडिया तो बुरा नहीं है। पर, खदेरन इन सब की उपयोगिता आज कल कोई खास नहीं है। उस पर से चोरी-चकारी का डर भी लगा ही रहता है। तुम फुलमतिया जी को हीरों का हार देने के बजाय कोई कार क्यों नहीं गिफ़्ट कर देते?”

खदेरन ने अपनी परेशानी बताई, “फाटक बाबू! ऐसी कार कहां से लेकर आऊं जो हो तो नकली पर दिखने में बिलकुल असली जैसी लगे!”

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

कटहा कुत्ता

खदेरन एक दिन भोरे-भोर देखता है कि फाटक बाबू अपने लॉन में टहल रहे हैं और उनके साथ एकठो कुत्ता भी टहल रहा है। उसको बड़ा आश्चर्य हुआ। अपने घर के बरामदा से ही खदेरन अपनी उत्सुकता शांत करने के लिए पूछा, “फाटक बाबू! कुत्ता खरीद लाए हैं का?”

फाटक बाबू बोले, “हां भाई खदेरन। का करें खंजन देवी पीछे पड़ गई थीं, कि कुक्कुर चाहिए … तो लाना पड़ा।”

खदेरन बोला, “बढिया किए। कब लाए?”

फाटक बाबू बोले, “रात में ही खरीद कर लाए हैं।”

खदेरन कुत्ता को कूं-कूं करते देखकर पूछा, “फाटक बाबू, आपका ई कुता काटता है..??”

फाटक बाबू बोले, “एक काम करो खदेरन, चले आओ हम भी यही देखना चाहते हैं……!”

सोमवार, 6 दिसंबर 2010

माचिस

अचानक शाम को बत्ती गुल हो गई। फाटक बाबू को मोमबत्ती जलाने के लिए माचिस की दरकार थी। घर में नहीं होने के कारण खदेरन से मांगा। देखिए क्या हुआ?

“ये कैसी माचिस लाकर दिए खदेरन। एक भी तीली नहीं जल रही।”

“लेकिन फाटक बाबू मैं तो सब चेक करके लाया हूं।”

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

खदेरन का लेटर

एक दिन बालकनी में बैठ कर खदेरन कुछ लिख रहा था। फाटक बाबू ने पूछा,”खदेरन, क्या कर रहे हो?”

खदेरन ने बताया,”लेटर लिख रहा हूं।”

“किसे”

“फुलमतिया जी को।”

“क्यॊं कहीं गईं हैं क्या? कल ही तो देखा था।”

“वो बाज़ार गई हैं। कुछ सामान लाने। कुछ याद आया तो सोचा बता दूं, उसे भी लेती आएंगी।”

“तो फोन कर लो ना, लेटर क्यों?”

“फुलमतिया जी को फोन ही तो किया था पहले। पर फोन से आवाज़ आई कि ‘प्लीज़ ट्राई लेटर।’ इसलिए मैं फुलमतिया जी को लेटर लिख रहा हूं।”

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

खदेरन के घर में चोर

एक दिन खदेरन के घर में चोर घुसा, पर फुलमतिया जी के हाथों बुरी तरह पिट गया।

हो-हल्ला सुन फाटक बाबू भी पहुंच गए। फुलमतिया जी की बहादुरी से प्रसन्न हो उन्होंने कहा, “फुलमतिया जी आप तो बहुत बहादुर हैं! आपने चोर को बहुत मारा!!”

फुलमतिया जी ने पहले तो आश्चर्य से फाटक बबू को देखा फिर उन्हें एक किनारे ले जाकर बोलीं, “दरअसल फाटाक बाबू, मुझे तो पता भी नहीं था कि वह चोर है!…. हां …. मैं तो समझी कि खदेरन देर से घर आया है ….. और …. म्म… रेस्ट इज़ हिस्ट्री…!”

फाटक बाबू बोले, “इसे मिस्ट्री ही रहने दीजिए…!”

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

खदेरन के घर में चहल-पहल

कुछ दिनों से खदेरन के घर में खूब चहल-पहल थी। पर खदेरन की कोई आवाज़ नहीं आ रही  थी। यह बात फाटक बाबू को परेशानी में डाले दे रही थी। खदेरन दिख भी नहीं रहा था।

आज सुबह-सुबह बरामदे में खदेरन दिख गया। फाटक बाबू ने उसे पास बुलाया और पूछा, “क्या कहीं बाहर गए थे?”

खदेरन ने कहा, “ नहीं, घर में ही था। … क्यों?”

images (6)फाटक बाबू ने हैरानी जताते हुए कहा, “अच्छा! पर दिखे नहीं कई दिनों से! इसी लिए पूछ लिया।” फाटक बाबू ने फिर पूछा, “तुम्हारे घर में आजकल बहुत चहल-पहल है। मेहमान आए हैं क्या?”

 

खदेरन ने जवाब दिया, “हां।”

फाटक बाबू खदेरन के इस संक्षिप्त उत्तर से संतुष्ट न होते हुए पूछा, “कौन-कौन आया है घर में, बहुत सारे लोग लग रहे हैं।”

खदेरन ने इस बार पूरा बताया, “मैं, मेरी पत्नी, मेरी सास, और चारों सालियां।”

फाटक बाबू ने मुस्कुराते हुए कहा, “तभी तो ! .. अब समझा कि तुम्हारी आवाज़ क्यों नहीं सुनाई दे रही थी!! आजकल तुम्हारा तो मुंह उसी वक़्त खुलता होगा जब तुम जम्हाई लेनी हो या छींक आती होगी!!!”

रविवार, 28 नवंबर 2010

नाम क्या है?

बच्चे जब किसी के सामने जाते हैं तो लोग उनसे कुछ न कुछ पूछते ही रहते हैं।

ऐसा ही भगावन के साथ भी हुआ।

पहली बार जब भगावन को लेकर खदेरन और फुलमतिया जी फाटक बाबू के यहां गए तो फाटक बाबू भगावन को देख कर बड़े खुश हुए और बोले, “अले ले ले … कित्ता प्याला छा बच्चा है!”

फिर खदेरन से पूछे, “अपने बेटे का क्या नाम रखा है?”

खदेरन के बोलने से पहले फुलमतिया जी ने जवाब दिया, “अभी उसका नाम नहीं रखा है, प्यार से उसे भग्गू कहते हैं!”

फाटक बाबू बोले, “बहुत अच्छा है।” फिर भगावन से पूछे, “बेटे आपके पिता जी का क्या नाम है?”

भगावन ने जवाब दिया, “अंकल अभी उनका नाम नहीं रखा है। बस प्यार से पापा-पापा कहता हूं।”

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

बात-चीत

अब फाटक बाबू क्यों नहीं परेशान हों खंजन देवी से। ज़रा दोनों की बात-चीत सुनिए….

“डिनर पर बाहर चलें?”

“हां”

“क्या खाओगी?”

“कुछ भी।”

“चाइनीज़?”

“नहीं, मुझे गैस हो जाता है।”

“साउथ इंडियन?”

“क्या फाटक बाबू परसों ही तो खाए थे।”

“तो .. फिर … नॉन भेज?”

“अभी छठ के समय, आप भी न … पर्व त्योहार का भी ख्याल नहीं रखते।”

“तो रोटी-तड़का?”

“वही बोरिंग खाना…।”

“तो फिर तुम्ही बताओ…क्या खाना है?”

“कुछ भी।”

सोमवार, 15 नवंबर 2010

दूसरा उदाहरण कोई नहीं

एक दिन गार्डेन में बैठा-बैठा खदेरन कुछ याद कर रहा था और मुस्कुरा रहा था। फाटक बाबू ने देखा तो पूछ लिया, “क्या बात है खदेरन? क्या याद आ गया?”

खदेरन बोला, “फाटक बाबू क्या बताएं, शादी के पहले की बात है।

फुलमतिया जी मुझे पसंद आ गईं थीं, तो चले गए उसके घर और फुलमतिया जी के पिता गेंदा सिंह को इंप्रेस करने के चक्कर में उनसे बोलना शुरु कर दिया,

सर जी, मेरे जैसा लड़का आप को चिराग लेकर ढूंढने पर नहीं मिलेगा। न तो मैं शराब पीता हूं, न ही अलब-कल्ब जाता हूं, दफ़्तर से भी सीधा घर आता हूं, आपकी बेटी मेरे साथ बहुत ख़ुश रहेगी।

तो जनते हैं फाटक बाबू फुलमतिया जी के पिता जी ने क्या कहा, उन्होंने कहा, सॉरी खदेरन बाबू, मैं अपनी बेटी की शादी आपसे नहीं कर सकता… अगर आपको दामाद बना लिया तो मेरी बीवी आपका उदाहरण दे-दे कर मेरा जीना मुश्किल कर देगी! हा-हा-हा….

बुधवार, 3 नवंबर 2010

नया चापरासी

आपको पिछले दिनों बताया था न कि एक ज़माने में फाटक बाबू बिज़नेस किया करते थे। और फिर उस

बिज़नेस का तगड़ा अनुभव! उन्हें हुआ था।

बात उन्हीं दिनों की है। उन्होंने अपने पार्टनर दोस्त को कम्पनी का मैनेजर रख लिया था ताकि उसका अनुभव काम आए। अपना दफ़्तर भी बनवा लिया उस प्रतिष्ठान में। एक नए चापरासी भी रख लिया।

उन्होंने नए नियुक्त किए गए चापरासी से कहा, “मैनेजर साहब ने तुम्हें बता दिया है ना कि तुम्हें क्या करना है?”

images (1) चापरासी ने प्रफुल्लित होकर कहा, “हां साहब! उन्होंने मुझे बता दिया है कि जब आपके आने की आवाज़ सुनूं, तो झटपट उन्हें जगा दूं!”

सोमवार, 25 अक्टूबर 2010

बुरा हाल!

बुरा हाल!

खदेरन एक दिन एकदम फटेहाल अवस्था में घर से बाहर खड़ा था। उसके चेहरे पर जगह-जगह लाल-काले निशान पड़े हुए थे। कई जगह तो सूजन भी आ चुकी थी। चेहरा उतरा हुआ था। सूरत रुआंसी थी।

फाटक बाबू की नज़र उसपर पड़ी। आश्चर्यचकित रह गए फाटक बाबू। उन्होंने खदेरन से पूछा,

“खदेरन भाई! अपने घर के बाहर क्यों खड़े हो? … और यह चोटें कैसे लगी?”

खदेरन बोला,

“हुआ यूं कि …….”

आगे कुछ खदेरन बोले उसके पहले ही फाटक बाबू ने उसकी बात काटते हुए कहना शुरु कर दिया,

“कितनी बार तुझसे कहा कि लोगों से झगड़ा मत किया करो। मगर मेरी बातों का तुम पर कोई असर थोड़े ही होता है। कमबख़्तों ने मार-मार कर तेरा कितना बुरा हाल कर दिया है?! बुरा हो उसका … कीड़े फड़े उसके। ……”

अब बारी खदेरन की थी। फाटक बाबू को आगे बोलने से रोकते हुए खदेरन बोला,

“बस-बस …. बंद कीजिए फाटक बाबू! मैं फुलमतिया जी के बारे में और ग़लत बातें नहीं सुन सकता!”

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

चिंतन!

चिंतन!

फाटक बाबू ने इस दशहरे के दर्म्यान ने वस्त्रों की खरीद में एक टी शर्ट खरीद लिया। और अपनी टी शर्ट पर लिख दिया
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खंजन देवी आज बहुत ख़ुश थीं। बोलीं, “SOLID JEE! THATS ATTITUDE! … THINK DIFFERENT & THINK POSITIVE!!”

बुधवार, 13 अक्टूबर 2010

दौलत की वजह से!

दौलत की वजह से!

आपको कुछ दिन पहले बताया था कि खदेरन के शादी ठीक हो रही थी तो क्या हुआ और फिर कैसे उसकी नज़र फुलमतिया जी की दौलत पर टिकी थी। (लिंक)

यह बात फाटक बाबू को मालूम हुई। वे तो बस गुस्से से बिफ़र ही पड़े। पहुंचे खदेरन की खोज खबर लेने। पूछा, “सुना है तुम फुलमतिया जी की दौलत, संपत्ति और बैंक बैलेंस के लिए उनसे शादी कर रहे हो?”

खदेरन ने कहा, “हां, ठीक ही सुना है।”

फाटक बाबू का गुसा और बढा, बोले, “खदेरन! यह तो बड़ी ग़लत बात है!”

खदेरन फुलमतिया - Copy - Copy खदेरन ने स्पष्ट किया, “अच्छा फाटाक बाबू आप ही बताइए कि क्या यह ग़लत बात नहीं होगी किए अपनी दौलत की वजह से फुलमतिया जी कुंआरी रह जाएगी।”vdwmu_th.jpg

बुधवार, 29 सितंबर 2010

अहमियत

अहमियत

सुबह सुबह फटक बाबू और खंजन देवी नाश्ता के टेबुल पर बैठे नाश्ता कर रहे थे। तभी खंजन देवी ने कहा, “एक बात मैं शर्त लगा कर कह सकती हूं, कि आज का दिन आपको याद नहीं होगा।”

फाटक बाबू दफ़्तर जाने की हड़बड़ी में थे। नाश्ते के टेबुल पर तो कुछ नहीं बोले, पर दफ़्तर जाने से पहले थोड़ा नराज़ स्वर में बोलते गए, “बिल्कुल याद है!” और फाटक बाबू निकल गए।

खंजन देवी उनको जाते हुए देखती रही।

१० बजे कॉल बेल बजी। खंजन देवी ने दरवाजा खोला तो सामने दफ़्तर का चापरासी एक बुके खंजन देवी को थमा गया। बोला साहब ने भिजवाया है।

१२ बजे फिर कॉल बेल बजी। खंजन देवी ने दरवाजा खोला तो सामने दफ़्तर का चापरासी चौकलेट से भरा बक्सा खंजन देवी को थमा गया। बोला साहब ने भिजवाया है।

२ बजे फिर कॉल बेल बजी। खंजन देवी ने दरवाजा खोला तो सामने दफ़्तर का चापरासी बुटिक से डिजाइनर ड्रेस खंजन देवी को थमा गया। बोला साहब ने भिजवाया है।

image0044 खंजन देवी फाटक बाबू के दफ़्तर से आने की प्रतीक्षा आज बड़ी बेसब्री से कर रही थी। ६ बजे फिर कॉल बेल बजी। खंजन देवी ने दरवाजा खोला तो सामने फाटक बाबू थे। खंजन देवी बोलीं, “पहले पुष्प गुच्छ, फिर चौकलेट, फिर इतना सुंदर ड्रेस, मुझे पता नहीं था कि मेरी मम्मी का जन्मदिन आपके लिए इतनी अहमियत रखता है।”

सोमवार, 13 सितंबर 2010

गाड़ी रोको!

गाड़ी रोको!

उस दिन फाटक बाबू ट्रेन से कही जा रहे थे। आरक्षित बर्थ पर स्थान ग्रहण करने के बाद खिड़की से बाहर झांका तो देखा चार आदमी बहुत ही धरफड़ी में गेट नं. एक से प्लेटफ़ार्म पर प्रवेश कर रहे हैं। फिर अपना आरक्षित डब्बा खोजने के क्रम में इधर-उधर देखते हैं। तब तक गाड़ी सरकनी शुरु हो गई।


वे चारो गाड़ी की तरफ़ तेज़ी से बढते हैं। तब तक गाड़ी तेज़ रफ़्तार हो गई। चारो गाड़ी के साथा दौड़ना आरंभ कर देते हैं। उनमें से दो के पास सामान था। वे ज़्यादा तेज़ दौड़ते हैं। दो के हाथ में कोई सामान नहीं था। वे उतनी तेज़ी से नहीं दौड़ पा रहे थे। सामान वाले दोनों ने गति बढाई और किसी तरह पौदान पकड़कर गाड़ी में घुसे और फाटक बाबू के बर्थ के पास आकर अपने हाथ का सामान ऊपर की बर्थ पर रखे। तभी उन्हें कुछ ख़्याल आता है। वे चिल्लाने लगते हैं


”गाड़ी रोको…! चेन खींचो…! गाड़ी रोको!”


उनको इस तरह चिल्लाते देख फाटक बाबू ने कहा, “अब आप शोर क्यों मचा रहे हैं? आपने गाड़ी तो पकड़ ही ली।”


उस व्यक्ति ने कहा, “जिन्हें इस गाड़ी से जाना था, वो तो नीचे ही रह गए। हम तो उन्हें सी ऑफ़ करने आए थे।”

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

खदेरन की समझदारी

खदेरन की समझदारी

खदेरन अब काफी समझदार होता जा रहा है। अब देखिए ना! उस दिन फाटक बाबू उसके यहां पहुंचे, और पूछे “क्‍या कर रहे हो खदेरन?”

खदेरन फुलमतिया - Copyखदेरन बोला “मक्खियां मार रहा हूँ।”

 

फाटक बाबू ने पूछा, “कितनी मारी?”

 

खदेरन फुलमतिया - Copyखदेरन ने जवाब दिया “पांच, जिसमें से तीन मेल थी और दो फीमेल।”

फाटक बाबू को आश्‍यर्च हुआ उन्‍होंने अपने आश्‍चर्य के समाधान के लिए पूछा- “तुम्‍हें कैसे पता कि कौन मेल थी और कौन फीमेल?”

खदेरन फुलमतिया - Copyखदेरन ने बड़े निश्चिंतता में जवाब दिया, “सीधी सी बात है फाटक बाबू। तीन शराब की बोतल पर बैठी थी और दो टेलिफोन पर।”

रविवार, 5 सितंबर 2010

लॉंन्ग ड्राइव पर….!

:: हंसने से चिंता, दुख,गुस्से, चिड़चिड़ेपन,आदि से निज़ात मिलती है। ::

लॉंन्ग ड्राइव पर….!


फाटक बाबू ने एक सेकेण्ड हैंड क्या थर्ड या फ़ोर्थ हैंड कार ख़रीद ली। फिर चलाना भी सीख लिया। एक दिन बहुत मिन्नत-मनौत करके खंजन देवी को घुमाने ले गए।


सड़क पर दिशाहीन भटकते देख कर खंजन देवी ने फाटक बाबू से पूछ ही लिया, “ऐ जी! हम कहां जा रहे हैं?”


फाटक बाबू ने जवाब दिया, “लॉन्ग ड्राइव पर ….!”

 

खंजन देवी से रहा नहीं गया, शिकायत कीं, “पहले क्यों नहीं बताया…?”


फाटक बाबू ने समझाया, “मुझे भी अभी-अभी ही पता चला है, जब कार का ब्रेक फ़ेल हुआ है….!”

सोमवार, 30 अगस्त 2010

ग़लती हो गई!

हंसना ज़रूरी है, क्यूंकि …


:: हंसने से टी सेल्स की संख्या में वृद्धि होने से हृदय रोग की कम संभावना होती है।

ग़लती हो गई!


फाटक बाबू खाने के टेबुल पर बैठे थे। उनका नौकर बुहारन खाना परोस गया। खाने का रूप-रंग देखकर फाटक बाबू की त्योरियां चढ गई। उन्होंने बुहारन से पूछा, “आज तुमने रोटी में कुछ ज़्यादा ही घी नहीं लगा दिया है?”

बुहारन ने डायनिंग टेबुल का मुयायना किया और स्थिति को स्पषट करते हुए कहा, “ग़लती हो गई! मालिक! लगता है मैंने आपको अपनी रोटी दे दी!!”

रविवार, 29 अगस्त 2010

डॉक्टर की फीस

:: एक मुस्कान ही शांति की शुरुआत है! ::

डॉक्टर की फीस


उस दिन फाटक बाबू बड़े बेचैन से थे। घबराहट और बेचैनी की वजह से वो इधर-उधर घूम रहे थे। फाटक बाबू को परेशान हाल देख खदेरन ने उन्हें सलाह दिया (?!), “आप डॉक्टर को दिखा क्यों नहीं लेते?”

फाटक बाबू ने खदेरन की सलाह पर अमल करना ही उचित समझा और पहुँच गए डॉक्टर उठावन सिंह की क्लीनिक।
डॉक्टर
उठावन सिंह  ने पूछा, “क्या हुआ है?”

फाटक बाबू ने बताया, “कुछ नहीं बस मामूली सा दर्द है।”

डॉक्टर उठावन सिंह ने निरीक्षण किया और घोषणा की, “आप तो मामूली दर्द बता रहे थे, लेकिन आपकी तो दिल की धड़कन भी बहुत बढी हुई है।”

फाटक बाबू बोले, “हां, जी, वो ओ आपकी फीस का बिल देख कर बढ़ी है।”

शनिवार, 28 अगस्त 2010

आने जाने में …

हंसना ज़रूरी है, क्यूंकि …


हंसने से हम मन की शक्ति का अधिक से अधिक प्रयोग कर पाते हैं।

आने जाने में …


आपको तो मालूम है फाटक बाबू ने गाड़ी ख़रीद ली है। पुरानी है तो क्या हुआ?

चलाना भी सीख लिया है, नवसिखुआ हैं तो क्या हुआ?

एक दिन उन्होंने खंजन देवी को कहा, “गाड़ी तो अब चलाना सीख ही गया हूँ। सोचता हूँ गांव हो आऊँ।”

maan_manthara खंजन देवी ने पूछा, “कब लौटेंगे?”


 

फाटक बाबू बोले, “कल शाम तक। कोई वहां रुकना थोड़े ही है। लोगों को गाड़ी दिखाना है। बस!”

… और फाटक बाबू चल दिए गांव के लिए। खंजन देवी उनके लौटने की प्रतीक्षा करती रहीं। फाटक बाबू लौटे छह दिनों के बाद।

maan_manthara चिंतित खंजन देवी ने पूछा, “आप तो बोले थे कि दूसरे दिन ही लौट आऊँगा, पर इतने दिन लगा दिए?”

फाटक बाबू ने बताया, “जाने में तो एक ही दिन लगा पर आने में पांच दिन लग गए।”

maan_manthara खंजन देवी की चिंता न मिटी। पूछी, “क्यों?”


 

फाटक बाबू ने बताया, “ये कार बनाने वाले भी ग़ज़ब के लोग हैं! जाने के लिए तो पांच गियर बनाए हैं, पर लौटने के लिए सिर्फ़ एक गियर है - (रिवर्स गियर!)।”