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रविवार, 29 नवंबर 2009

नोंक-झोंक -4

अगर पसंद आया तो दिल खोलकर ठहाका लगाइएगा।

कभी कभी लेने के देने पड़ जाते हैं। कुछ अच्छा करने जाओ तो मामला और बिगड़ जाता है।
उस दिन खाते हुए श्रीमान ने कह दिया आज खाना खराब बना है।
बस श्रीमती जी शुरु हो गईं। तुम्हें तो अब फाइव स्टार का ही खान अच्छा लगेगा। मेरे हाथ का बना तो कुछ भी अच्छा नहीं होता। आदि-आदि।
श्रीमान ने सोचा इस झगड़ा झंझट से तो अच्छा है कि खाने की तारीफ ही कर दिया करूं।
दूसरे दिन जो भी मिला खाने के बाद श्रीमान ने उसकी तारीफ के पुल बांध दिए।
अब श्रीमती जी फिर शुरु हो गईं। हां-हां आज का तुम्हें क्यों नहीं अच्छा लगेगा। तुम्हें तो मेरे हाथ का खाना खराब लगता है। आज मेरी तबियत खराब थी तो पड़ोसन से मांग कर लाई। यह तुम्हें तो अच्छा लगेगा ही।


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अगर पसंद आया तो ठहाके लगाइएगा
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