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बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

कहर बरपाते हुए मौसम में

झमा-झम वर्षा हो रही थी।

कड़क-कड़क कर बिजली चमक रही थी।

भीगता-भागता खदेरन एक दूकान में धुसा। हांफते-कांपते दुकानदार से बोला, “बड़े भाई! एक डबल रोटी दे दीजिए।”

दुकानदार ने उसकी दयनीय स्थिति देखी। उसे तरस आया। वह पूछ बैठा, “क्या आप शादी-शुदा हैं?”

बेहाल-हाल वाले खदेरन ने चेहरे पर लटकी पानी की बूदों को झटकते हुए कहा, “आप क्या समझते हैं कि इस कहर बरपाते हुए मौसम में मेरी मां मुझे घर के बाहर भेजेगी?”

11 टिप्‍पणियां:

  1. भाभी जी! ई तो लघुकथा हो गया... इसको आपके ब्लॉग पर होना नहीं चाहिए था!!

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  2. सलिल सर, ये सूक्ष्म कथा हो गयी...एकदम नानो कहानी....बहुत गूढ़ वाला...

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  3. हंस ले मगर कई घरों की हकीकत है ये !

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  4. hi..

    pati to hamesha se bechare rahe hain...aaj bhi hain....

    sundar....

    Deepak

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