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सोमवार, 23 अगस्त 2010

चुप, वरना …

हंसना ज़रूरी है, क्यूंकि …


सांस को बाहर की ओर निकालते हुए खुलकर हो-हो .. हो-हो करके हंसने से नाभि पर प्रभाव पड़ता है, जिससे लीवर और कीडनी मज़बूत होते हैं और उनकी कार्य क्षमता बढ़ती है।

चुप, वरना …


खदेरन बाज़ार से गुज़र रहा था तो उसने देखा कि एक फल वाला अंगूर बेच रहा है लेकिन बोल रहा है ….
”आलू ले लो आलू …”
खदेरन फुलमतिया - Copy - Copy उसे यह सुन कर रहा नहीं गया और उसने उस फलवाले से पूछ ही लिया, “तुम तो भाई अंगूर बेच रहे हो तो फिर आलू ले लो आलू … क्यों बोल रहे हो?”

फलवाले ने खदेरन को समझाया, “चुप, वरना मक्खियां सुन लेंगी।”

15 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा है।


    सुंदर प्रस्तुति!
    राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है।

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  2. अच्छा बेवकूफ बनाया मख्खियों को. :)

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  3. badhiya hai ji aadmi to bane banaye befakuf hai unko kya banana ha ha ha

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  4. भ्रम तो दिलाना ही पड़ता है...जी ..हाहा

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