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सोमवार, 10 मई 2010

नोंक-झोंक

 

दफ्तर से घर पहुँचकर श्रीमान जी ने श्रीमती जी को आवाज़ लगाते हुए कहा, “दिन भार फइलों में सर खपाते-खपाते मैं तो आधा पागल हो गया हँ।”

श्रीमतीजी जो रसोई में काम कर रही थीं वहीं से बोलीं, “कोई भी काम तो पूरा कर लिया करो।”

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