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शुक्रवार, 14 मई 2010

गरीबों की सुनो!

गरीबों की सुनो!

वह सड़क पर जा रहा था

हाथ फैलाए

और गा रहा था

“गरीबों की सुनो

वो तुम्‍हारी सुनेगा

तुम एक रूपया दोगे

वो दस करोड़ देगा!”

सामने से गुजर रही श्रीमतीजी ने

देखा उसे घूर कर

और बोली

“शर्म नहीं आती

मुर्गे की तरह बांगते हो

और हाथ फैला कर

सड़क पर भीख मांगते हो।”

भिखारी पहले घबराया

फिर मुस्‍काया

बोला,

“तो क्‍या एक आफत और मोल लूँ

आपसे एक रूपये पाने की चाहत में

क्या दफ्तर ही खोल लूँ।”

12 टिप्‍पणियां:

  1. आपका अन्दाज निराला, पर कई तो वाकई दफ्तर खोले बैठे हैं

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  2. ........ निराला अन्दाज
    maja aa gaya.............

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  3. ये एन.जी.ओ वाले तो दफ्तर ही खोल कर बैठे हुए हैं...
    मजेदार प्रस्तुति

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