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शनिवार, 31 जुलाई 2010

मारधाड़

हंसना ज़रूरी है, क्यूंकि …


हंसने से श्‍वसन तंत्र, पेट, पीठ और चेहरे की मांसपेशियां चुस्त-दुरुस्त रहती हैं।

मारधाड़


फुलमतिया जी से बार-बार निवेदन कर खदेरन उनको फ़िल्म दिखाने ले गया। सिनेमा हॉल में खदेरन को नींद आ गई। कुछ ही देर में वह खर्राटे भरने लगा। खर्राटे ले रहे पति को जगाते हुए फुलमतिया जी बोलीं, “इतनी अच्छी फ़िल्म चल रही है और तुम सो रहे हो?”

खदेरन ने सफ़ाई देते हुए कहा, “क्या खाक अच्छी फ़िल्म है? जिस फ़िल्म में मारधाड़ न हो वह भी कोई फ़िल्म है?”

फुलमतिया जी का तेवर चढा, बोलीं, “मारधाड़ ही चाहिए थी, तो घर पर बताते, यहां आने की क्या ज़रूरत थी!”

16 टिप्‍पणियां:

  1. हाहाहाहा....लाख टके की बात है. .

    फुलमतिया जी कितनी समझदार हैं। खदेरन निरा अहमक, पहले बता देता तो पैसे भी बच जाते.मनोरंजन फ्री में होता सो अलग....अब ये न पूछना कि मनोरंजन किसका?

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  2. हा हा!! वो तो फुलमतिया दिखा दी...

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  3. सही है
    पैसे खर्च करने की क्या जरूरत थी

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  4. जे बात ...
    कई लोंग मार धाड़ से बचने के लिए घर से बाहर का और ब्लॉगिंग का रुख करते हैं ...:):)

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  5. बिचारा...जहां मौका मिला सो गया.

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  6. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  7. khaderan ji ki ab khair nahi fulamatiya ji ab pure jos me aa gaii hai ha ha ha

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  8. खदेरन..
    फाटक बाबू...
    खंजन देवी...

    :)

    एक तो आपके पात्रों के नाम ही इतने मजेदार होते हैं..की नाम पढ़ते ही मुस्कान आ जाती है..

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